हमेशा से ही सोचा करता था कि जीवन के कुछ पन्ने हमेशा ही खुले-अधखुले से होते हैं। कुछ पढ़ लिए जाते हैं और कुछ छूट जाते हैं कहीं पीछे। जब मैंने अपने एकांत और दिल्ली के बारे में लिखने के बारे में सोचा तो लगा कि ये तो बहुत ही बड़ा समय था तो क्या पूरा लिखूं लेकिन फिर सोचा कि नहीं। वो लम्हें, ख्याल ही हैं जो सामने आएं तो बेहतर, ज्यादा कुछ नहीं, सिर्फ पल हैं पलों का ब्यौरा नहीं। जहां छोड़ आया था वहां से आगे।
पढ़ाई के दिन तो खत्म होगए थे। अब नौकरी के चक्कर में लगा हुआ दिन-रात सिर्फ और सिर्फ एक जुनून, नौकरी का जुनून। मुझे आधी से अधिक दिल्ली और दिल्ली के आधे से ज्यादा ऐतिहासिक स्थल इस चक्कर में घूमा चुका था। लेकिन अफसोस हर जगह नकारती हुई ये ‘दिल्ली’ मुझे कहीं पीछे छोड़ती जा रही थी।
जब भी हार-थक जाता तो किसी भी पार्क में घुस जाता और जहां छांव मिलती वहीं सुस्ता लेता। साथ ही आगे आने वाले भरेपूरे संघर्षपूर्ण दिनों के बारे में सोचने लगता। उस कल्पना में खो जाता और पाता कि पेड़ जिनके नीचे ये कल्पनाएं हुआ करती थीं वो अधिकतर कुछ मशहूर स्थलों में से हुआ करते। इसी कारण अधिकतर मशहूर स्थलों को देखता परखता अपनी आगे की यात्रा के लिए हिम्मत बटोरता शांत और स्थिरता के वातावरण को अपनी जीवनशैली में ढालता आगे चल देता।
उन जगहों से मिली ताकत के चलते तकरीबन आधे दर्जन महीनों के बाद जीवन के पतझड़ मौसम में बहार ने कदम रखा। फिर लगा जिंदगी जीवंत है और यह जीवन मेरे लिए अमूल्य है। दिल्ली में जिंदगी यापन के लिए एक वक्त में ही दो जगह काम करने लगा। तब भी लगता कि वक्त बच गया कुछ कश्मकश में इधर उधर घूमता रहा और रास्ते साथ चलते रहे और राह बनती रही। लेकिन सुकून के नाम पर कुछ जगहें फिर भी सुकून कहां। तभी लिखने के सिलसिले को आगे बढ़ाया।
दिन बीतते गए और कब-कब में आठ वर्षों का लंबा सफर निकल गया। इस सालों का आंकलन कर पाना मेरे जैसे ‘तुच्छ’ प्राणी के लिए मुश्किल है। परंतु इन वर्षो के लंबे सफर में जिन वस्तुओं के आकर्षण से मोहित होकर मैं यहां आया था। उसमें धीरे-धीरे धूल की वो मोटी परत जम गई की उसे चाह कर भी ना हटा सका। नौकरी के चक्कर में उलझकर जो वस्तुएं शादी के बाद ध्यान में रहती वो पहले ही ध्यान रहने लगी-नून, तेल और गैस। रोजमर्रा की दिनचर्या में जो कुछ शुमार था, तो वो बसों की धक्का-मुक्की और तू तू मैं मैं, अपने से ज्यादा दो पैसे रखे उस पर्स का ध्यान रखना, जो पीछे की जेब में हमेशा पड़ा रहता। वो कान फाड़ देने वाला शोर, प्रदूर्षण, बेफालतू का हॉर्न बजाती गाड़ियां। दिन प्रतिदिन बढ़ती भीड़ और इस भीड़ में मेरे जैसे ही ना जाने कितने अपने भाग्य को आजमाने इस महानगर दिल्ली में आए थे। खुद को असहाय, मजबूर, लाचार उन परिस्थतियों को अपने ऊपर से गुजारते रहने पर मजबूर ये अदना से इंसान.....जो अक्सर खुद से बाते करता और सोचता...वो चंद लाइनें....उस फिल्म की....दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन....।
मुझे याद आती तो सिर्फ और सिर्फ वो ढ़लती सर्दी की वो दोपहर और वो ‘एकांत’ जिसने मुझे इस समंदर में ढ़केल दिया। आज भी याद आता है मुझे वो एकांत जिसमें मैं अपनी कल्पनाओं के समंदर में डूबा करता था। कभी यहां की तो कभी वहां की सोचा करता था। सोलह साल का अंतराल बहुत होता है। अकेला ही इस शहर में आया था, चलता रहा, कुछ अपने मिले, कुछ अपने पराए हो गए। पर अब वक्त ही नहीं इन सब के लिए, उस एकांत के लिए। अपने हर वक्त पर किसी और का वक्त ओढ़ कर चलता हूं। लेकिन अब फिर दिल ढूंढता है वो सोलह साल पहले का एकांत, फिर से कुछ वक्त अपने लिए।
याद आती हैं निदा फाज़ली जी की वो चंद लाइनें ----
....और तो सब कुछ ठीक है, लेकिन...
कभी-कभी यूं ही...
चलता फिरता शहर अचानक...
तन्हा लगता है.....।
आपका अपना
नीतीश राज
"जय हिन्द, फिर मिलेंगे"
3 years ago