Thursday, October 2, 2008

"17 साल से शमशान में एक कब्र, इंतजार चिता का"

दुश्मनी, सर और सरहद भाग-2
अब तक कर्ना भील 70 के दशक में रेगिस्तान का सबसे ख़तरनाक लुटेरा सरकार की कोशिशों के चलते उसने सरेंडर कर दिया। बदले में सरकार ने कर्ना को जैसलमेर में ही एक जमीन का टुकड़ा रहने के लिए दिया। लेकिन एक दिन जमीन के झगड़े में इल्यास नाम के एक पड़ोसी का क़त्ल हो गया। क़त्ल के बाद कर्ना को पकड़ लिया गया और जेल भेज दिया गया। पर इल्यास का परिवार तो खून के बदले खून की मांग कर रहा था। वो उसको जेल भेजे जाने से ही खुश नहीं थे। वो कर्ना से एक भयानक बदला लेना चाहते थे। इस बदले के लिए इल्यास के परिवार वालों ने बकायदा एक कसम भी खाई। कसम भी कोई ऐसी-वैसी नहीं। खून के बदले खून की क़सम। कर्ना का सर काटकर पाकिस्तान की एक दरगाह पर चढ़ाने की कसम। हत्यारों ने लगभग 17 साल तक का इंतजार किया और फिर जिस रोज उन हत्यारों को मौका मिला उन्होंने अपनी कसम को पूरा करने की ठान ली।
अच्छे चाल चलन के कारण पैरुल पर कर्ना को छोड़ दिया गया। एक रोज कर्ना राम अपनी ऊंट गाड़ी पर चारा लेने बाजार जा रहा था। रास्ते में घात लगाए इल्यास के रिश्तेदारों ने कर्ना राम से लिफ्ट मांगी, कर्ना राम उन्हें नहीं पहचानता था, लिहाजा उसने गाड़ी में उन्हें बिठा लिया। इसके बाद रास्ते में मौका मिलते ही उन्होंने कर्ना का सर धड़ से अलग कर दिया। सर हाथों में लिए रेगिस्तान के रास्ते वे पाकिस्तान भाग गए। वो दिन है और आज का दिन कर्ना राम का सर कभी नहीं मिला। हालांकि ये खबर जरूर आई कि कातिलों ने उसका सर लाहौर में एक दरगाह पर चढ़ा दिया। चाहे कुछ हो पर सरकार ने कर्ना के सर पर बाकायदा इनाम भी रखा हुआ था लेकिन उसी सर का इंतजार पिछले 17 साल से आज भी जैसलमेर के शमशान में पड़ा उसका शरीर कर रहा है और उसका सर पिछले 17 सालों से सरहद पार पाकिस्तान में किसी की कसम पूरी कर रहा है।
यहां कर्ना राम का परिवार पुलिस और प्रशासन से कर्ना भील के सर को वापस लाने की मांग कर रहा है। जबकि वहीं सर लाने की बात तो दूर पुलिस तो क़ातिल तक का सुराग नहीं लगा पाई है। 17 साल का समय बहुत होता है परिवार खुद लाहौर जा कर वो सर वापस लाना चाहता है इसलिए उसने प्रशासन से पाकिस्तान जाने की इज्जात मांगी है। 17 साल का अर्सा बेहद लंबा होता है। अगर अब कातिल का पता भी चल जाए तो भी कर्ना के परिवार वालों को उनके मुखिया का सर मिलना मुश्किल है। अब सवाल जो उठता है कि कब तक वो शमशान अपने में एक कब्र को बनाए रखेगा? तो क्या कर्ना हमेशा इसी तरह शमशान में चिता के बेहद करीब होते हुए भी चिता से दूर कब्र में लेटा रहेगा? इनके जवाब अभी अधूरे और बाकी हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

9 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

यह भी क्या दुश्मनी निभाने की रीत है ..

PREETI BARTHWAL said...

अच्छी कहानी है। लेकिन इस तरह से दुश्मनी निभाने से दुश्मनी खत्म नही होती बल्कि बढ़ती ही है।

Udan Tashtari said...

गजब दुश्मनी है भाई!!

राज भाटिय़ा said...

बाप रे ऎसे ऎसॆ लो भी मिलते हे दुनिया मे , लेकिन कर्ना भी कोन सा शरीफ़ आदमी था.
धन्यवाद

सचिन मिश्रा said...

bahut badiya.

कुन्नू सिंह said...

पिछले पोस्ट मै मैने वर्डप्रेस का बताया था वो भी जीनहोने अपने वेबसाईट मे वर्डप्रेस डाला हो। पर blogspot का कोई स्क्रीपट नही बना है।
ईसलीये ब्लागरो को बस अपना पासवर्ड और ईमेल ठीक से रखना है।

नीतीस राज जी, आप ठीक कह रहे हैं। पर हैकींग मे भी दो चीजे होती हैं।

एक तो अपने ही सीस्टम मे जैसे रजीस्ट्री ईडीट करना, लागआन स्क्रीन बदलने को भी हैकींग कहते हैं और मै ईसी हैकींग की बात कर रहा हूं।

एक तरफ से ईसका ये मतलब हूवा की आपको सिस्टम पर पूरा कमांड आना चाहीये।

और आपके प्रगती मे देश का प्रगती भी तो छीपा है। और देश के प्रगती मे मेरा भी प्रगती होगा।
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कीतना खतरनाक दूशमनी है। एक दम फिल्मी कहानी जैसा लग रहा है।
बहुत बढीया लीखे हैं आप।

योगेन्द्र मौदगिल said...

मूरखों की कमी नहीं..
ऐसे लोगों को मूरखों की श्रेणी में ही रखना उचित है.
वीभत्स..!!!!

कुन्नू सिंह said...

आपके ईमेल का ईंतजार कर रहा हूं अभी तक मीला नही kunnu_singh18@yahoo.co.in

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

तीर स्नेह-विश्वास का चलायें,
नफरत-हिंसा को मार गिराएँ।
हर्ष-उमंग के फूटें पटाखे,
विजयादशमी कुछ इस तरह मनाएँ।

बुराई पर अच्छाई की विजय के पावन-पर्व पर हम सब मिल कर अपने भीतर के रावण को मार गिरायें और विजयादशमी को सार्थक बनाएं।